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अमरावती जिले के वझ्झर प्रारूप की सराहना

जिले के परतवाड़ा के समीप स्थित वझ्झर की एक हरियाली से पटी पहाड़ी पर सौ से डेढ़ सौ बच्चे पूरे समय अपने कार्य में मग्न नजर आते हैं। इन सभी बच्चों के पिता का नाम है, शंकरबाबा पापड़कर। स्व. अंबादास पंत वैद्य बालगृह के माध्यम से उन्होंने अनाथ, मतिमंद, दृष्टिहीन और मूकबधिर बच्चों का सफलतापूर्वक पुनर्वास किया है। उनके ‘वझ्झर मॉडेल की सभी ने सराहना भी की है। देश के ऐसे लावारिस बच्चों के पुनर्वास के लिए कोई कानून होना चाहिए, ऐसी मांग लंबे अरसे से हो रही है, जिसे राजनेता और मंत्री सुन तो लेते हैं लेकिन उसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है, यह व्यथा सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्ताओं ने व्यक्त की है। पिछले तीन दशक से शंकरबाबा पापलकर इस मांग को लेकर निरंतर संघर्ष कर रहे हैं लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिल पायी है। बाल संरक्षण कानून वर्ष 2000 में अस्तित्व में आया लेकिन उसमें भी 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके अनाथ बच्चों के पुनर्वास को लेकर सरकार ने गंभीरता से कोई विचार नहीं किया। बाल संरक्षण कानून 2000 के अनुसार बच्चों का विभाजन ‘विधि संघर्षग्रस्त बालक (जिसके हाथों कोई अपराध हो गया हो, ऐसा बालक या बालिका और ध्यान और सुरक्षा की जिसे जरुरत हो ऐसे बालक-बालिका), इन दो हिस्सों में किया गया है। पहले हिस्से में बच्चों को 18 वर्ष तक ही निरीक्षण गृह में रखा जाता है जबकि जिन्हें अधिक ध्यान देने और सुरक्षा की जरुरत होती है, ऐसे बच्चों को 18 वर्ष पूरे होने के बाद भी कुछ अपवादात्मक स्थिति में 21 वर्ष पूरे होने तक बालसुधार गृह में रखने की अनुमति दी जाती है। लेकिन ऐसे बच्चों के यदि पालक हैं तो उनके पालकों को बच्चे की जिम्मेदारी देने का प्रयास किया जाता है। यदि पालक नहीं हैं तो बच्चे को दत्तक देने की भी व्यवस्था कानून में की गई है। लेकिन जिन बच्चों के पालक नहीं हैं और किसी ने दत्तक भी न लिया हो, उन बच्चों के पुनर्वास और पढ़ाई का सवाल खत्म अब भी बना हुआ है। 18 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे बालगृह में रहकर कम से कम माध्यमिक और उच्च माध्यमिक कक्षा तक पढ़ ही लेते हैं। उन्हें सरकार की ओर से पढ़ाई में शिक्षा शुल्क, छात्रवृत्त, शासकीय छात्रावास में किसी प्रकार की कोई सुविधाएं नहीं दी जातीं। फलस्वरूप ऐेसे बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाते हैं और ठीक इसी समय बालगृह के द्वार भी उनके लिए बंद हो जाते हैं। इसके बाद यह बच्चे कहां जाते हैं, क्या करते हैं, इसका कोई रिकार्ड सरकार के पास नहीं है। ऐसे अनाथ बच्चों को राशनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र, निवासी प्रमाणपत्र, अल्पभूधारक प्रमाणपत्र, आधारकार्ड इस तरह के किसी भी प्रकार के सरकारी दस्तावेज देने की व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। ऐसे में अनाथ बच्चों का अंतिम पुनर्वास और सामाजिक विलीनीकरण होना नामुमकिन हो चुका है। इस पर भी यदि यह अनाथ बच्चे दृष्टिहीन, मूक-बधिर या विकलांग हों तो उनका जीवन और भी मुश्किल हो जाता है। भारत में हर वर्ष एक लाख से अधिक लड़के-लड़कियां आयु के 18 वे वर्ष के बाद सरकारी नियमानुसार बालगृह से बाहर निकाल दिए जाते हैं। विकलांगता का बोझ लेकर कहां जाएं, यह सवाल उनके समक्ष होता है। यह निराधार लड़के—लड़कियां बाद में क्या करते हैं, इसकी किसी को भी जानकारी नहीं है, न इनका कोई सर्वेक्षण होता है और न ही कहीं किसी दस्तावेज में इनके संबंध में कोई जानकारी दर्ज है। ऐसे बच्चों के शोषण और उन्हें भिक्षुक बनाए जाने की आशंका शंकरबाबा पापलकर कई बार व्यक्त कर चुके हैं। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए कानून बनाना आवश्यक है और जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर इस तरह का कानून बनाने की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाना चाहिए, ऐसी भावना सामाजिक क्षेत्र के कार्यकर्ताओं ने व्यक्त की है। बाक्सक्या है वझ्झर प्रारूप?वझ्झर मॉडेल यानी बालगृह में रहनेवाले सभी बच्चों के पिता का एक ही नाम है। इन बच्चों के निवासी प्रमाणपत्र बनाए गए हैं। आधारकार्ड भी बनाए गए हैं। इन सभी दस्तावेजों पर बच्चों के पिता का नाम शंकरबाबा पापलकर लिखा है। वझ्झर ग्राम पंचायत से निवासी प्रमाणपत्र और उसी आधार पर उनका आधारकार्ड बनाया गया है। इन बच्चों को कार्यशाला के माध्यम से विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाता है। शंकरबाबा पापलकर दिव्यांग, मतिमंद बच्चों को भी सामान्य जीवन जीने का अधिकार दिलवाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। बाक्ससंगीत क्षेत्र में बालगृह की गांधारी की उड़ान वझ्झर बालगृह की गांधारी इस दृष्टिहीन बालिका ने मुंबई स्थित गंधर्व महाविद्यालय से संगीत विशारद की सातवीं परीक्षा प्रथम क्रमांक से उत्तीर्ण होने का गौरव प्राप्त किया है। उसे संगीत विषय का ज्ञान आर.एस. तलवी ने दिया। हाल ही में जिलाधिकारी पवनीत कौर वझ्झर के बालगृह पहुंची, तब उन्होंने गांधारी की इस सफलता पर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। बाक्सदेशभर से हर वर्ष एक लाख से अधिक बच्चों को बालगृह के बाहर निकाला जाता है, लेकिन बाद में उनका क्या होता है, इसका कहीं कोई पंजीयन नहीं होता। इसलिए देश के 18 वर्ष से ऊपर के लावारिस, दिव्यांगों के पुनर्वास का कानून बनाया जाना चाहिए, इसके लिए हम निरंतर प्रयास करते हुए सरकार को यह कानून बनाने के लिए बाध्य करेंगे। – शंकरबाबा पापलकर, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता

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